यूपीचे अभंग! (ढिंग टांग)

- ब्रिटिश नंदी
गुरुवार, 9 मार्च 2017

नको विश्‍वनाथा। अंत आता पाहू।
किती काळ साहूं। निवडणुका।।

किती आजे काके। चुलते नि मामे।
दंगल ही जमे। रणांगणी।।

बापालागीं आता। पुत्र विचारीना।
बाप जुमानीना। कोणालाही।।

काय वानूं आता। काकाचे करतूत।
त्याला सियासत। म्हणताती।।

सायकलीचे टायर। जाले गा पंक्‍चर।
त्यामाजी सत्वर। पंप मारी।

इतुक्‍यात येई। आणि येक पुत्र।
तोचि एकमात्र। रावराणा।।

खानदानाची गा। पाठीवरी झूल।
हूल की राहूल। तुम्ही जाणा।।

नको विश्‍वनाथा। अंत आता पाहू।
किती काळ साहूं। निवडणुका।।

किती आजे काके। चुलते नि मामे।
दंगल ही जमे। रणांगणी।।

बापालागीं आता। पुत्र विचारीना।
बाप जुमानीना। कोणालाही।।

काय वानूं आता। काकाचे करतूत।
त्याला सियासत। म्हणताती।।

सायकलीचे टायर। जाले गा पंक्‍चर।
त्यामाजी सत्वर। पंप मारी।

इतुक्‍यात येई। आणि येक पुत्र।
तोचि एकमात्र। रावराणा।।

खानदानाची गा। पाठीवरी झूल।
हूल की राहूल। तुम्ही जाणा।।

नोटबंदीमुळे। गजाचा विलाप।
डोक्‍याला हा ताप। झाला गे माये।।
 
काहीही करोनी। सत्ता हडपावी।
इडापीडा जावी। टळोनिया।।

सत्तेचे लालस। कुणाला चुकले।
बाकीचे शिकले। मागाहून।।

पुढारी बोलला। पुढारी चालला।
पुढारी बैसला। खाटेवरी।।
उचलुनी आणिली। तीच मस्त खाट।
दाविलीस वाट। विश्‍वनाथा।।

तसा सायकलीवर। होता माझा डोळा।
केला नाही गाळा। तरीसुद्धा।।

तैसेचि कमळ। फुलले भोलेनाथा।
तुझ्या चरणी माथा। टेकिला म्या।।
 
संपला प्रचार। नुरे मतदान।
थोडे ताणबाण। उणावले।।

शिमग्याचे उरे। थोडेसे कवित्व।
जीवन करी जीवित्व। पूर्णब्रह्म।।

पडलो इरेला। केली दगदग।
किती तगमग। झाली जीवा।।

जीवनात केली। किती आपाधापी।
अवघाचि यूपी। माझा व्हावा।।

याचसाठी केला। होता अट्टहास।
शेवटला दीस। काशीत जावो।।

मारिली ना पाल। न मारिले मार्जार।
तरी येरझार। चुकला नाही।।

नित्य मी वदलो। काशीस का जावे।
आणि मनोभावे। आंघोळावे।

घाटा घाटावरी। प्यायलो गा पाणी।
तरी चक्रपाणि। अप्रसन्न।।
काय करु देवा। काय फेडू पांग।
वाटेल ते सांग। मनीचे गूज।।

एक राजा। बाकीची शिबंदी।
त्यांना नोटबंदी। मला नाही।।

घालोनि रुद्राक्ष। माळांवरी माळा।
त्रिपुटी कपाळा। लावियेली।।

नंदी म्हणे साधु। संत येती घरा।
दिवाळी दसरा। दुजा नाही।।

Web Title: dhing tang artical