कफल्लकाचे अभंग! (ढिंग टांग)

ब्रिटिश नंदी
शनिवार, 10 डिसेंबर 2016

बरे झाले देवा। केले कफल्लक।
डोक्‍याची तकतक। नष्ट झाली।।

हजाराची नोट। गेली घाटावरी।
पाश्‍शेचीही हरी। नोट गेली।।

उरता उरला । हाती चिल्लरखुर्दा।
जणू जुना जर्दा। चुन्यावीण।।

हरी पत्ती म्हणा। हरी पत्ती म्हणा।
शून्याची गणना। कोण करी।।

पन्नास नि वीस। दहा आणि पाच।
आंकडे हे साच। किरकोळ।।

सहस्र हाकले। पाश्‍शेही पांगले।
शिंक्‍याला टांगले। दोन हजार।।

संसार असार। मायामोह सारा।
सोन्याचा पिंजरा। जाण बाळा।।

ठेवो नये चित्त। धनसंपदेशी।
पडशील फशी। मरशील।।

बरे झाले देवा। केले कफल्लक।
डोक्‍याची तकतक। नष्ट झाली।।

हजाराची नोट। गेली घाटावरी।
पाश्‍शेचीही हरी। नोट गेली।।

उरता उरला । हाती चिल्लरखुर्दा।
जणू जुना जर्दा। चुन्यावीण।।

हरी पत्ती म्हणा। हरी पत्ती म्हणा।
शून्याची गणना। कोण करी।।

पन्नास नि वीस। दहा आणि पाच।
आंकडे हे साच। किरकोळ।।

सहस्र हाकले। पाश्‍शेही पांगले।
शिंक्‍याला टांगले। दोन हजार।।

संसार असार। मायामोह सारा।
सोन्याचा पिंजरा। जाण बाळा।।

ठेवो नये चित्त। धनसंपदेशी।
पडशील फशी। मरशील।।

गळां लागुनिया । परवशतापाश।
जितेपणी लाश। होशील की।।

असशी जरी खास। घरचा मालक।
ठरशी शर्विलक। राजरोस।।

स्वत:च्या घरात। स्वत:ची तिजोरी।
तरीही मुजोरी। साधेना बा।।

होते नि नव्हते। केले ब्यांकार्पण।
दाती धरोनि तृण। शरणचि आलो।।

असुनि संसारी। आली गा विरक्‍ती।
आता फक्‍त भक्‍ती। ऑनलैन।।

फिटता फिटेना। तुझा क्‍याशमोह।
नियमांचा दाह। जाळी जीवा।।

विटेवरी उभा। विठ्ठल ठाकडा।
हिशेब रोकडा। भक्‍तां मागे।।

युगे अठ्ठावीस। रांगेमधी उभा।
तरी पद्‌मनाभा। मोक्ष नाही।।

पन्नास दिसांचे। खडतर व्रत।
हार किंवा जीत। आरपार।।

उभा रहा ऐसा। रांगेत गुमान।
नाहीतर मान। मुर्गळीन।।

तहानभुकेची। नको करु तमा।
पुण्य होई जमा। आपोआप।।

पन्नास दिसांचे। मावळले तीस।
उरले गा वीस। अवघेचि।।

हेही दिस राया। जातील उडून।
नंतर अच्छे दिन। क्षितिजाशी।।

नसे कांप्युटर। हाती नाही सेल।
त्याने डिजिटल। होऊ नये।।

नंदी म्हणे आता। व्हावे डिजिटल।
नशीब फुटंल। अन्यथा रे।।

टॅग्स