ढिंग टांग :  साथीचे अभंग! 

ब्रिटिश नंदी
Friday, 17 April 2020

काय म्हणू याला। जीवन ऐसे नाव। 
मरणाने ठाव। धरियेला।। 

भुंकार विस्मरले। गल्लीतले सुणे। 
दिवाभीत जिणे। नशिबाला।। 

काय देवा आली। आम्हावरी वेळ। 
नुरे काही मेळ। सुखदु:खा।। 

कुडीतले प्राण। कुडीतचि बंद। 
आनंदाचा कंद। कुजला की।। 

काय म्हणू याला। जीवन ऐसे नाव। 
मरणाने ठाव। धरियेला।। 

भुंकार विस्मरले। गल्लीतले सुणे। 
दिवाभीत जिणे। नशिबाला।। 

चौकाचौकामाजी। उभे पहारेकरी। 
हाती काठी धरी। परजत।। 

दाबिले मुस्कट। तोंडाला फडके। 
प्राण हा अडके। ठायी ठायी।। 

भयभीत पाखरु। पानोळीं दडिले। 
मुक्‍याने पडिले। टप्पदिशी।। 

वृक्षवल्ली साऱ्या। स्तब्ध नि:शब्द। 
मनातले अब्द। मनातचि।। 

कालची हिरवाई। गमते ओसाड। 
सारेच उजाड। जीवितची।। 

ैमौनात आभाळ। निशब्द ही माती। 
शुष्क नातीगोती। चराचरी।। 

सुस्तावले रस्ते। सुनसान गावे। 
वस्तीवरोनी धावे। वरवंटा।। 

गोजिऱ्या गावात। भुताचा वावर। 
आगळा पाहुणचार। विषाणूचा।। 

काळोख दाटला। येथ ठायी ठायी। 
थकली गा ध्याई। पांडुरंगा।। 

कुपीत भराया । विषाणूचे भूत। 
कुणी अवधूत। येईल का?।। 

वाचवी आम्हाला। संकट हे घोर। 
कुठले अघोर। फैलावले?।। 

माणसापासोनी। तुटतो माणूस। 
नाही मागमूस। मानव्याचा।। 

पुन्हा काय देवा। येई अस्पृश्‍यता। 
वर्ग विषमता। परतेल?।। 

थंड पडे चूल। थंड कारुनारु। 
नाही दवादारु। आजाऱ्याला।। 

भयभीत विश्‍व। भयभीत देश। 
ृमृत्यूची गा रेष। लांबलेली।। 

चौक सुनसान। घर ओकेबोके। 
इस्पितळीं बाके। गजबजली।। 

कुणी खोकताहे। कुणी शिंकताहे। 
श्‍वास चालताहे। कसाबसा।। 

दिसो लागे मज। डोळ्यांपुढे काळ। 
तुटेना गा नाळ। तरीसुद्धा।। 

कुठल्याही क्षणी। येईल रे अंत। 
असला वेदांत। नको आम्हा।। 

अरे कारुणिका। का रे बळें बळें। 
केले तोंड काळे। काय तुवा?।। 

येई बा विठ्ठला। वाचीव रे आम्हा। 
तूचि विष्णू ब्रह्मा। शिवहि तूच।। 

किलकिल्या नेत्री। पाहियले तुवा। 
अवतार नवा। धारियेला।। 

एक आश्‍वासक। उपाय निकोप। 
तुझा स्टेथास्कोप। शुभंकर।। 


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